उत्तराखंड की सैन्य परंपराएं,कुमाऊं रेजीमेंट, गढ़वाल रेजीमेंट

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उत्तराखंड की सैन्य परंपराएं,कुमाऊं रेजीमेंट, गढ़वाल रेजीमेंट

उत्तराखंड की सैन्य परंपराएं

 

 

कुमाऊं रेजीमेंट-

कुमाऊं रेजीमेंट देश की सबसे पुरानी रेजीमेंटों में से एक है । इसकी स्थापना 27 अक्टूबर 1788 में हुई थी ।  1788 में बराड़ के नवाब सलावत खान ने अलीपुर ब्रिगेड की स्थापना की थी  । इसी ब्रिगेड की पहली बटालियन 4 कुमाऊं के नाम से भी यह जानी जाती है । इसके 35 वर्ष के बाद इसकी दूसरी बटालियन 5 कुमाऊं के रूप में पुनर्स्थापित हुई थी ।

       हैदराबाद निजाम के दरबार में रिमोड नामक फ्रांसीसी अधिकारी ने 1797 में फर्स्ट ब्रेड इन्फेंट्री का गठन किया था । आज इसे दो कुमाऊं नाम से जाना जाता है । 1917 में क करनल लागर ने पहले कुमाऊं राइफल की स्थापना की थी ।

इसे अब रेजीमेंट में तीन कुमाऊं राइफल के नाम से जाना जाता है।  स्वाधीनता के उपरांत सिंधिया रियासत की चार ग्वालियर इन्फेंट्री को 14 कुमाऊं के तौर पर कुमाऊं रेजीमेंट में शामिल किया गया।

जिसे बाद में मैकेनाइज्ड इन्फेंट्री नाम दिया गया । 27 अक्टूबर 1945 को इस कुमाऊं रेजीमेंट नाम दिया गया था । इस रेजीमेंट का मुख्यालय में 1948 में रानीखेत बनाया गया कुमाऊं रेजीमेंट ने भारतीय सेवा को तीन सी अध्यक्ष जनरल SM श्री नागेश 1955 से 1957 जनरल K S THIMAYA  1957 से 1961 और जनरल टी एन रैना 1975 से 1978 प्रदान किए गए थे ।

इनके अलावा भारत का प्रथम सर्वोच्च रक्षा सम्मान परमवीर चक्र मरणोपरांत कर कुमाऊं रेजीमेंट के मेजर सोमनाथ शर्मा को मिला था ।  कुमाऊं ग्रेजीमेंट की दूसरी शताब्दी 1788 से 1988 पर भारत सरकार द्वारा डाक टिकट जारी किया गया था।

 

 

गढ़वाल रेजीमेंट

 

5 म‌ई सन 1887 को तीसरी गोरखा रेजीमेंट की दूसरी बटालियन से अल्मोड़ा में गढ़वाली बटालियन का गठन हुआ ।

इ‌से तीसरी कुमाऊं रेजीमेंट नाम भी दिया गया था तथा कालो डंडा, जो अब लैंड से डॉन के नाम से प्रसिद्ध है। छावनी बनाने का काम सौंप दिया गया था सन 1851 में 6 गढ़वाली कंपनियों की मदद से 39वीं गढ़वाली रेजीमेंट ऑफ बंगाल इन्फेंट्री का गठन किया गया ।क्षजिसे वर्मा में चीनियों के विरुद्ध अभूतपूर्व सफलता हासिल की सन 1892 में इसे राइफल का खिताब मिला |

सन 1901 में इसे दूसरी बटालियन 49 गढ़वाल राइफल्स रेजीमेंट ऑफ बंगाल इन्फेंट्री का गठन हुआ वह बाद में इसका नामकरण सेकेंड बटालियन 39 गढ़वाल राइफल कर दिया गया 2 फरवरी 1921 में इसे रॉयल खिताब मिला वह इसका नाम बदलकर 39 सी रॉयल गढ़वाल राइफल हुआ सन 1922 में सैन्य पुनर्गठन के बाद इसका नाम 18वीं रॉयल गढ़वाल राइफल्स हुआ |

वह अप्रैल 1945 में इसे रॉयल गढ़वाल राइफल्स कहा जाने लगा देश को स्वाधीनता मिलने के उपरांत इसका नामकरण डी गढ़वाल राइफल हुआ अक्टूबर नवंबर 2012 में रेजीमेंट ने अपनी स्थापना की 125 सी 1887 से 2012 तक जयंती मनाई इस अवसर पर रेजीमेंट पर डाक टिकट भी जारी किया गया है|

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