उत्तराखंड का इतिहास प्रागैतिहासिक काल

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उत्तराखंड का इतिहास प्रागैतिहासिक काल –

उत्तराखंड का इतिहास
उत्तराखंड का इतिहास

उत्तराखंड भारत का एक महत्वपूर्ण हिमालय राज्य है। जिसे प्राचीन काल से ही देवभूमि के नाम से भी जाना जाता है। यहां की भौगोलिक स्थिति पर्वतीय संरचना नदिया वन और प्राकृतिक संसाधन मानव जीवन के लिए सदैव अनुकूल बनी रही है। यही कारण है कि उत्तराखंड में मानव का निवास अत्यंत प्राचीन काल से रहा है। प्रागैतिहासिक काल के अंतर्गत उसे समय का अध्ययन किया जाता है| जब मानव ने लिखना प्रारंभ नहीं किया था और इतिहास को लिखित रूप में दर्ज नहीं किया गया था। इस कल की जानकारी हमें पुरातात्विक साक्ष जैसे पाषाण उपकरण से चित्र को गुफाएं कंकाल और धातु से बने अफसोसों से मिली है। उत्तराखंड के विभिन्न क्षेत्रों में किए गए पुरातात्विक अन्वेषणों से यह प्रमाणित होता है कि यहां पाषाण युग से लेकर तम युग तक मानव सभ्यता का विकास हुआ है। यहां की गुफाएं और चट्टानों पर बने शैलचित्र मानव के जीवन और उनकी गतिविधियां आस्था और सामाजिक संरचना को दर्शाते हैं इन साक्ष के आधार पर हम उत्तराखंड के प्रज्ञा ऐतिहासिक जीवन को समझ सकते हैं लिए इसका गहन अध्ययन करते हैं।

प्रागैतिहासिक काल की विशेषताएं-

प्रागैतिहासिक काल को मुख्य रूप से तीन भागों में बांटा गया है| पूरा पाषाण काल मध्य पाषाण काल तथा नवपाषाण काल

पुरा पाषाण काल-

इस काल में मानव पत्थर के औजारों का उपयोग करता था और मुख्य रूप से शिकारी एवं खाद्य संग्रह करता था।

मध्य पाषाण काल–

मध्य पाषाण काल में छोटे औजार मनुष्य के द्वारा बनने लगे थे मानव धीरे-धीरे स्थाई और जीवन की ओर कदम बढ़ा रहा था ।

नव पाषाण काल –

इस काल में कृषि और पशुपालन का विकास हो गया था मानव ने स्थाई बस्तियां बसाने शुरू कर दी थी उत्तराखंड में इन तीनों कालों के विभिन्न प्रमाण अलग-अलग जगह से मिले हैं जिससे यह सिद्ध होता है कि यहां मानव सभ्यता का क्रमिक विकास हुआ था।

 

 

उत्तराखंड में प्रागैतिहासिक काल के साक्ष्य-

लाखू गुफा –

लाखू गुफा उत्तराखंड की सबसे प्रसिद्ध शैल चित्रों में से एक है इसकी खोज 1963 में की गई थी यह अल्मोड़ा जिले के बड़े चने के पास स्थित है यहां की चट्टानों पर लाल कल तथा सफेद रंगों से चित्र बनाए गए हैं जो की देखने में अत्यंत आकर्षक होते हैं| इन चित्रों में मानव समूह पशु आकृतियां शिकार के दृश्य तथा नृत्य करते हुए लोगों को दर्शाया गया है | इन चित्रों से यह स्पष्ट होता है कि उसे समय के लोग समूह में नृत्य करते थे और सामूहिक रूप से शिकार करते थे | इसके अंतर्गत नृत्य के यह बड़े शौकीन होते थे नृत्य की यह चित्र यह संकेत देते हैं कि उनके जीवन में मनोरंजन सामाजिक गतिविधियों महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं लाखों उदियार के सेल चित्र न केवल कलात्मक दृष्टि से महत्वपूर्ण है|  बल्कि वह उसे समय की सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों को भी प्रदर्शित करते हैं।

ग्वारखया गुफा-

 

चमोली जिले में यह गुफा स्थित है यह गुफा अलकनंदा जी के किनारे पर स्थित है यह महत्वपूर्ण गुफा में से एक है यहां से प्राप्त सेल चित्रों में मानव भेद और 12 सिंगर जैसे पशुओं के चित्र मिले हैं इन चित्रों में रंगों का प्रयोग किया गया था क्योंकि उसे समय की कला को दर्शाता है पशुओं के चित्रों में यह भी पता चलता है कि उसे समय मानव शिकार के साथ-साथ पशुपालन भी होता था

किमनी गुफा-

 

क्यों नहीं गांव चमोली जिले के थराली क्षेत्र में स्थित है प्रागैतिहासिक साक्ष के लिए यह प्रसिद्ध है यहां की गुफाओं में सफेद रंग का प्रयोग हुआ है इन चित्रों में हथियार और पशुओं के चित्रण को प्रदर्शित किया है इससे यह अनुमान लगाया जाता है कि उसे समय मानव ने हथियार का निर्माण और उनका उपयोग करना सीख लिया था यह मानव की तकनीकी का संकेत देता है

मलारी गांव –

मल्हारी गांव चमोली में स्थित है। उत्तराखंड के सबसे महत्वपूर्ण पूरा स्थलों में से एक है। यह तिब्बत सीमा के पास स्थित है।
इस स्थान पर 2001 में गढ़वाल विश्वविद्यालय द्वारा खुदाई की गई थी जिसमें कई महत्वपूर्ण अवशेष प्राप्त हुए थे इनमें मानव कंकाल मिट्टी के बर्तन जानवरों के अवशेष और लगभग 5.2 किलो ग्राम सोने का मुखौटा प्राप्त हुआ था | यह खोज अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह एसिस्ट होता है कि उसे समय के लोग शिकार ही नहीं करते थे बल्कि वह सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से भी विकसित है मिट्टी के बर्तनों की यहां पर प्राप्ति हुई है | जो यह संकेत देते हैं कि वह भोजन को संग्रहित करते थे जबकि सोने का मुखौटा यह दर्शाता था कि भी आभूषण और सजावट के प्रति सूची रखते थे यह स्थल उत्तराखंड के प्रागैतिहासिक काल के उन्नत स्तर को प्रदर्शित करता है।

लवेथाप –

ललिता आपसे प्राप्त सेल चित्र में मानव को शिकार करते और नृत्य करते हुए दिखाया गया है यह चित्र उसे समय के जीवन को प्रदर्शित करते हैं शिकार के दृश्य यह बताते हैं कि मानव अपने भोजन के लिए प्रकृति पर पूर्ण रूप से निर्भरता जबकि नृत्य यह दर्शाता है कि उनके जीवन में सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियां शामिलथी

हुडली-

 

हुडली उत्तरकाशी में है। उत्तरकाशी जिले का यह प्रसिद्ध स्थान है इस जगह से जो शैल चित्र प्राप्त हुए हैं वह नीली स्याही का प्रयोग हुआ है समानता प्रगति ऐतिहासिक क्षेत्र में लाल और सफेद रंग का प्रयोग अधिक होता है इसलिए नीले रंग का प्रयोग विशेष महत्व रखता है यह दर्शाता है कि उसे समय के लोग विभिन्न रंगों का ज्ञान रखते थे और उनका उपयोग कलात्मक अभिव्यक्ति के लिए किया करते थे।

पेट साल-

यह स्थान अल्मोड़ा में स्थित है पेट विशाल और पुणे कोर्ट गांव के बीच यह काफर कोर्ट से प्राप्त होता है यहां पर नृत्य करते भी मानव के आकृतियां पाई गई हैं यह चित्र समूह और सामाजिक गतिविधियों को सांकेतिक करते हैं।

फल सीमा-

फल सीमा से प्राप्त शैल चित्र में मानव को योग और नृत्य करते हुए दिखाई दिखाया गया है। यह अत्यंत रोचक तथ्य है कि क्योंकि इससे यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि प्राचीन काल में लोग योग और ज्ञान जैसे परंपराओं को पर विश्वास करते थे।

बनकोट-

बनकोट पिथौरागढ़ जिले में स्थित है यहां से आठ तांबे से बनी हुई मानव की आकृतियां प्राप्त नहीं है यह खोज अध्ययन महत्वपूर्ण है क्योंकि यह ताम्र युग के प्रारंभ का संकेत देती है ताम्र के उपयोग से यह स्पष्ट होता है कि मानव ने धातुओं का उपयोग करना प्रारंभ कर लिया था उसे इसका ज्ञान था जो उसके तकनीकी और सांस्कृतिक विकास का महत्वपूर्ण चरण माना गया है।

 

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उत्तराखंड का परिचय-

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